केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि भारत खनन एवं धातु क्षेत्र में प्रौद्योगिकी आधारित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ चाहता है और उसे संसाधन आधारित लाभ से हटकर प्रौद्योगिकी आधारित प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ना होगा, जिसमें भूवैज्ञानिक अन्वेषण एवं खनन से लेकर प्रसंस्करण, रसद, पुनर्चक्रण एवं अनुगामी विनिर्माण तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में प्रौद्योगिकी का एकीकरण आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता अब केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि कितना खनिज निकाला जाता है या धातु का उत्पादन होता है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि भारत कितनी कुशलता, सुरक्षा, स्थिरता और बुद्धिमत्ता से अपने भूवैज्ञानिक संसाधनों को उच्च-मूल्यवान, उदार और चक्रीय सामग्री आपूर्ति श्रृंखलाओं में परिवर्तित करता है। उन्होंने विभिन्‍न प्रौद्योगिकी परियोजनाओं से आगे बढ़ते हुए ऐसी परस्पर जुड़ी, विस्तार योग्य और विश्वसनीय प्रौद्योगिकी प्रणालियों की ओर बढ़ने का आह्वान किया जो औद्योगिक स्तर पर इस क्षेत्र को बदल सकें।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह विचार नई दिल्ली स्थित एफआईसीआई फेडरेशन हाउस में आयोजित एफआईसीआई सम्मेलन के तीसरे संस्करण के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए व्‍यक्‍त किए। इस सम्‍मेलन का विषय “खनन और धातु उद्योग में डिजिटलीकरण, एआई, स्वचालन और प्रौद्योगिकी एकीकरण: क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना” था। दो दिवसीय इस सम्मेलन में नीति निर्माता, उद्योगपति, प्रौद्योगिकी प्रदाता, स्टार्टअप, शोधकर्ता और अंतरराष्ट्रीय भागीदार भारत के खनिज आधारित उद्योगों में प्रौद्योगिकी को अपनाने पर चर्चा करने के लिए एक साथ आए हैं। भारत में केपीएमजी इस सम्मेलन का ज्ञान भागीदार है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का खनन और धातु क्षेत्र एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रहा है क्योंकि देश 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह क्षेत्र अवसंरचना विकास, ऊर्जा परिवर्तन, विनिर्माण वृद्धि, आत्मनिर्भरता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में अवसंरचना, घरेलू विनिर्माण, डिजिटल अवसंरचना, नवाचार और निवेश के समर्थन से देश की वृद्धि ने प्रमुख क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी आधारित विस्तार के लिए आवश्यक क्षमता और पैमाना तैयार किया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि खनन और धातु उद्योग में प्रतिस्पर्धा की चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं। अयस्क की घटती गुणवत्ता, अधिक गहराई और अधिक जटिल भंडार, ऊर्जा और रसद लागत, महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं का भू-राजनीतिक केंद्रीकरण, कार्बन उत्सर्जन कम करने की आवश्यकताएं और ग्राहकों की बदलती अपेक्षाएं एक नए प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता पैदा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि इसलिए प्रौद्योगिकी को एक अलग पूंजी निवेश या कुछ प्रायोगिक परियोजनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि खनिज संसाधन से लेकर धातु और उसके बाद की मूल्य श्रृंखला तक फैले एक रणनीतिक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्‍होंने ने कहा कि डिजिटल प्रौद्योगिकियां भूवैज्ञानिक, परिचालन, उपकरण, प्रक्रिया, ऊर्जा, रसद और बाजार संबंधी आंकड़ों को एक साथ ला सकती हैं, जिससे बेहतर दृश्यता, पूर्वानुमान, समन्वय और स्वचालन के माध्यम से त्वरित और अधिक सटीक निर्णय लेने में मदद मिलेगी। प्रक्रिया प्रौद्योगिकियां निष्कर्षण और पुनर्प्राप्ति में सुधार कर सकती हैं, निम्न श्रेणी के अयस्कों और अवशेषों का दोहन कर सकती हैं, ऊर्जा और जल की खपत को कम कर सकती हैं, कम कार्बन वाले धातु निर्माण को बढ़ावा दे सकती हैं और पृथक्करण, शोधन, उन्नत सामग्री और पुनर्चक्रण में क्षमताओं को मजबूत कर सकती हैं, जिससे लागत कम होगी और घरेलू और वैश्विक बाजारों में भारतीय खनिजों और धातुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने पृथक्करण, शुद्धिकरण, शोधन, उन्नत सामग्री, चुंबक निर्माण, पुनर्चक्रण और संबंधित उपकरण, कौशल और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में भारत को घरेलू क्षमताएं विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जो प्रौद्योगिकियां पहले से ही परिपक्व हो चुकी हैं, उन्हें लागू किया जाना चाहिए और उनका विस्तार किया जाना चाहिए, जबकि अप्रयुक्त संसाधनों का पहले प्रक्रिया सत्यापन किया जाना चाहिए और फिर उनका विस्तार किया जाना चाहिए। जहां रणनीतिक क्षमताएं अभी तक वाणिज्यिक स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं, वहां भारत को उन्हें विकसित करना चाहिए या चुनिंदा साझेदारों के साथ मिलकर घरेलू जानकारी विकसित करनी चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय उन्नत सामग्री, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, साइबर-फिजिकल सिस्टम, सेंसिंग, स्वच्छ ऊर्जा, जैव प्रौद्योगिकी, भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों और डीप-टेक उद्यमिता के क्षेत्र में वैज्ञानिक उत्कृष्टता को औद्योगिक परिणामों से जोड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अंतःविषयक साइबर-फिजिकल सिस्टम पर राष्ट्रीय मिशन के तहत स्थापित 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र स्मार्ट खानों, संयंत्रों और आपूर्ति श्रृंखलाओं से सीधे संबंधित क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, उद्यमिता और उद्योग सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने 1 लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना का जिक्र करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य उच्च प्रभाव वाले अनुसंधान एवं विकास और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि यह योजना दीर्घकालिक वित्तपोषण, स्टार्टअप्स के लिए इक्विटी समर्थन और गहन प्रौद्योगिकी वित्तपोषण तंत्र के माध्यम से प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर 4 और उससे ऊपर की परिवर्तनकारी परियोजनाओं का समर्थन कर सकती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रौद्योगिकी आधारित परिवर्तन के अगले चरण में राष्ट्रीय मिशनों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योग जगत की समस्याओं, स्टार्टअप्स, परीक्षण सुविधाओं और जोखिम पूंजी को एक साथ लाना आवश्यक है, ताकि आशाजनक प्रौद्योगिकियां प्रयोगशाला से प्रायोगिक स्तर तक और प्रायोगिक स्तर से औद्योगिक स्तर तक पहुंच सकें। उन्होंने कहा कि व्यापक क्षेत्र में परिवर्तन के लिए मूल्य-केंद्रित प्रौद्योगिकी को अपनाना, मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा, औद्योगिक स्तर पर परीक्षण और प्रदर्शन, कुशल मानव संसाधन और सरकार, उद्योग, शिक्षा जगत और नवप्रवर्तकों के बीच गहन सहयोग की आवश्यकता होगी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने खनन और धातु उद्योग से उच्च मूल्य वाली परिचालन और प्रक्रिया संबंधी चुनौतियों के एक केंद्रित समूह की पहचान करने और सहयोगात्मक विकास और सत्यापन के लिए सुविधाएं, डेटा और डोमेन विशेषज्ञता स्थापित करने का आग्रह किया। उन्होंने प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्रों को प्रदर्शन विनिर्देशों, लागत लक्ष्यों, योग्यता मानकों और वाणिज्यिक तैनाती के स्पष्ट मार्गों सहित उद्योग की आवश्यकताओं के साथ मिलकर काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

भारतीय परिचालन की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए तकनीकी समाधानों की मांग करते हुए उन्‍होंने कहा कि प्रौद्योगिकी कंपनियों और स्टार्टअप्स को विविध भू-आकृतियों, बंजर भूमि संयंत्रों, कठिन पर्यावरणीय परिस्थितियों, वहनीयता, अंतरसंचालनीयता और व्यापकता को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी अपनाने की सफलता का मापन केवल प्रोटोटाइप, पेटेंट या पायलट परियोजनाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि उन प्रौद्योगिकियों के माध्यम से किया जाना चाहिए जो प्रमाणित, अपनाई गई, दोहराई गई और व्यावसायिक रूप से उपयोग में लाई गई हों, साथ ही अर्थव्यवस्था, उद्योगों, पर्यावरण, कार्यबल और समुदायों के लिए उनके द्वारा सृजित मूल्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हमें केवल अगली पीढ़ी की खनन और धातु प्रौद्योगिकियों को अपनाने से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमारा लक्ष्य भारत में, भारत के लिए और विश्व के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास, प्रदर्शन और व्यापक उपयोग करना होना चाहिए। उन्होंने सम्मेलन के साथ जारी विचार नेतृत्व रिपोर्ट के लिए एफआईसीसी और केपीएमजी इंडिया को बधाई भी दी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत@ 2047 की परिकल्पना के अनुरूप, तकनीकी रूप से उन्नत, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार खनन और धातु पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।